श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.19.23

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

समागताः सर्वत एव सर्वे

वेदा यथा मूर्तिधरास्त्रिपृष्ठे।

नेहाथवामुत्र च कश्‍चनार्थ

ऋते परानुग्रहमात्मशीलम्॥ २३

samāgatāḥ sarvata eva sarve

vedā yathā mūrtidharāstripṛṣṭhe|

nehāthavāmutra ca kaścanārtha

ṛte parānugrahamātmaśīlam|| 23

अर्थ

‘महात्माओ! आप सभी सब ओरसे यहाँ पधारे हैं। आप सत्यलोकमें रहनेवाले मूर्तिमान् वेदोंके समान हैं। आपलोगोंका दूसरोंपर अनुग्रह करनेके अतिरिक्त, जो आपका सहज स्वभाव ही है, इस लोक या परलोकमें और कोई स्वार्थ नहीं है॥ २३॥

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