॥ श्रीहरिः ॥
यच्छ्रोतव्यमथो जप्यं यत्कर्तव्यं नृभिः प्रभो।
स्मर्तव्यं भजनीयं वा ब्रूहि यद्वा विपर्ययम्॥ ३८
yacchrotavyamatho japyaṃ yatkartavyaṃ nṛbhiḥ prabho|
smartavyaṃ bhajanīyaṃ vā brūhi yadvā viparyayam|| 38
अर्थ
भगवन्! साथ ही यह भी बतलाइये कि मनुष्यमात्रको क्या करना चाहिये। वे किसका श्रवण, किसका जप, किसका स्मरण और किसका भजन करें तथा किसका त्याग करें?॥ ३८॥
यच्छ्रोतव्यमथो जप्यं यत्कर्तव्यं नृभिः प्रभो।
स्मर्तव्यं भजनीयं वा ब्रूहि यद्वा विपर्ययम्॥ ३८
भगवन्! साथ ही यह भी बतलाइये कि मनुष्यमात्रको क्या करना चाहिये। वे किसका श्रवण, किसका जप, किसका स्मरण और किसका भजन करें तथा किसका त्याग करें?॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.19.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 180) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/19/38/