श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.19.38

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

यच्छ्रोतव्यमथो जप्यं यत्कर्तव्यं नृभिः प्रभो।

स्मर्तव्यं भजनीयं वा ब्रूहि यद्वा विपर्ययम्॥ ३८

yacchrotavyamatho japyaṃ yatkartavyaṃ nṛbhiḥ prabho|

smartavyaṃ bhajanīyaṃ vā brūhi yadvā viparyayam|| 38

अर्थ

भगवन्! साथ ही यह भी बतलाइये कि मनुष्यमात्रको क्या करना चाहिये। वे किसका श्रवण, किसका जप, किसका स्मरण और किसका भजन करें तथा किसका त्याग करें?॥ ३८॥

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