श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.19.6

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

या वै लसच्छ्रीतुलसीविमिश्र-

कृष्णाङ्‌घ्रिरेण्वभ्यधिकाम्बुनेत्री।

पुनाति लोकानुभयत्र सेशान्

कस्तां न सेवेत मरिष्यमाणः॥ ६

yā vai lasacchrītulasīvimiśra-

kṛṣṇāṅghrireṇvabhyadhikāmbunetrī|

punāti lokānubhayatra seśān

kastāṃ na seveta mariṣyamāṇaḥ|| 6

अर्थ

गंगाजीका जल भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंका वह पराग लेकर प्रवाहित होता है, जो श्रीमती तुलसीकी गन्धसे मिश्रित है। यही कारण है कि वे लोकपालोंके सहित ऊपर-नीचेके समस्त लोकोंको पवित्र करती हैं। कौन ऐसा मरणासन्‍न पुरुष होगा, जो उनका सेवन न करेगा?॥ ६॥

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