श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.2.22

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

अतो वै कवयो नित्यं भक्तिं परमया मुदा।✎ 986 987

वासुदेवे भगवति कुर्वन्त्यात्मप्रसादनीम्॥ २२

ato vai kavayo nityaṃ bhaktiṃ paramayā mudā|

vāsudeve bhagavati kurvantyātmaprasādanīm|| 22

अर्थ

इसीसे बुद्धिमान् लोग नित्य-निरन्तर बड़े आनन्दसे भगवान् श्रीकृष्णके प्रति प्रेम-भक्ति करते हैं, जिससे आत्मप्रसादकी प्राप्ति होती है॥ २२॥✎ 27

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #27 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #986 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भंिक्त → भंिक्तिं
  • #987 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भंिक्तिं → भक्तिं

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