श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.3.31

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

यथा नभसि मेघौघो रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले।

एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभिः॥ ३१

yathā nabhasi meghaugho reṇurvā pārthivo'nile|

evaṃ draṣṭari dṛśyatvamāropitamabuddhibhiḥ|| 31

अर्थ

जैसे बादल वायुके आश्रय रहते हैं और धूसरपना धूलमें होता है, परन्तु अल्पबुद्धि मनुष्य बादलोंका आकाशमें और धूसरपनेका वायुमें आरोप करते हैं—वैसे ही अविवेकी पुरुष सबके साक्षी आत्मामें स्थूल दृश्यरूप जगत‍्का आरोप करते हैं॥ ३१॥✎ 32

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #32 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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