श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.3.37

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

न चास्य कश्चिन्‍निपुणेन धातुरवैति जन्तुः कुमनीष ऊतीः।✎ 1505

नामानि रूपाणि मनोवचोभिः सन्तन्वतो नटचर्यामिवाज्ञः॥ ३७

na cāsya kaścinnipuṇena dhāturavaiti jantuḥ kumanīṣa ūtīḥ|

nāmāni rūpāṇi manovacobhiḥ santanvato naṭacaryāmivājñaḥ|| 37

अर्थ

जैसे अनजान मनुष्य जादूगर अथवा नटके संकल्प और वचनोंसे की हुई करामातको नहीं समझ पाता, वैसे ही अपने संकल्प और वेदवाणीके द्वारा भगवान्‌के प्रकट किये हुए इन नाना नाम और रूपोंको तथा उनकी लीलाओंको कुबुद्धि जीव बहुत-सी तर्क-युक्तियोंके द्वारा नहीं पहचान सकता॥ ३७॥✎ 33 34

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #33 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #34 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1505 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: धातु- रवैति → धातुरवैति

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