श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.3.39

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अथेह धन्या भगवन्त इत्थं यद्वासुदेवेऽखिललोकनाथे ।

कुर्वन्ति सर्वात्मकमात्मभावं न यत्र भूयः परिवर्त उग्रः॥ ३९

atheha dhanyā bhagavanta itthaṃ yadvāsudeve'khilalokanāthe |

kurvanti sarvātmakamātmabhāvaṃ na yatra bhūyaḥ parivarta ugraḥ|| 39

अर्थ

शौनकादि ऋषियो! आपलोग बड़े ही सौभाग्यशाली तथा धन्य हैं जो इस जीवनमें और विघ्न-बाधाओंसे भरे इस संसारमें समस्त लोकोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्णसे वह सर्वात्मक आत्मभाव, वह अनिर्वचनीय अनन्य प्रेम करते हैं, जिससे फिर इस जन्म-मरणरूप संसारके भयंकर चक्रमें नहीं पड़ना होता॥ ३९॥

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