श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.3.9

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तुर्ये धर्मकलासर्गे नरनारायणावृषी।

भूत्वाऽऽत्मोपशमोपेतमकरोद् दुश्‍चरं तपः॥ ९

turye dharmakalāsarge naranārāyaṇāvṛṣī|

bhūtvā''tmopaśamopetamakarod duścaraṃ tapaḥ|| 9

अर्थ

धर्मपत्नी मूर्तिके गर्भसे उन्होंने नर-नारायणके रूपमें चौथा अवतार ग्रहण किया। इस अवतारमें उन्होंने ऋषि बनकर मन और इन्द्रियोंका सर्वथा संयम करके बड़ी कठिन तपस्या की॥ ९॥✎ 29

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #29 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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