श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.4.6

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

कथमालक्षितः पौरैः सम्प्राप्तः कुरुजाङ्गलान्।

उन्मत्तमूकजडवद्विचरन् गजसाह्वये॥ ६

kathamālakṣitaḥ pauraiḥ samprāptaḥ kurujāṅgalān|

unmattamūkajaḍavadvicaran gajasāhvaye|| 6

अर्थ

कुरुजांगल देशमें पहुँचकर हस्तिनापुरमें वे पागल, गूँगे तथा जडके समान विचरते होंगे। नगरवासियोंने उन्हें कैसे पहचाना?॥ ६॥✎ 1278 1279

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1278 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पाण्डव-नन्दन → पाण्डवनन्दन
  • #1279 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नगर-वासियोंने → नगरवासियोंने

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