श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.14

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

ततोऽन्यथा किञ्चन यद्विवक्षतः

पृथग्दृशस्तत्कृतरूपनामभिः ।

न कुत्रचित्क्वापि च दुःस्थिता मति-

र्लभेत वाताहतनौरिवास्पदम्॥ १४

tato'nyathā kiñcana yadvivakṣataḥ

pṛthagdṛśastatkṛtarūpanāmabhiḥ |

na kutracitkvāpi ca duḥsthitā mati-

rlabheta vātāhatanaurivāspadam|| 14

अर्थ

जो मनुष्य भगवान्‌की लीलाके अतिरिक्त और कुछ कहनेकी इच्छा करता है, वह उस इच्छासे ही निर्मित अनेक नाम और रूपोंके चक्करमें पड़ जाता है। उसकी बुद्धि भेदभावसे भर जाती है। जैसे हवाके झकोरोंसे डगमगाती हुई डोंगीको कहीं भी ठहरनेका ठौर नहीं मिलता, वैसे ही उसकी चंचल बुद्धि कहीं भी स्थिर नहीं हो पाती॥ १४॥✎ 40 41 42 43 44 45 46 1571 1572

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (9)
  • #40 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #41 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #42 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #43 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #44 शब्दोंके बीचका स्थान: कोअर्पण → को अर्पण
  • #45 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #46 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1571 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुरुषोत्तम-भगवान्‌के → पुरुषोत्तमभगवान्‌के
  • #1572 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अचिन्त्य-शक्ति → अचिन्त्यशक्ति

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