श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.19

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

न वै जनो जातु कथञ्चनाव्रजे-

न्मुकुन्दसेव्यन्यवदङ्ग संसृतिम्।

स्मरन्मुकुन्दाङ्घ्र्युपगूहनं पुन- ✎ 2005

र्विहातुमिच्छेन्‍न रसग्रहो यतः॥ १९

na vai jano jātu kathañcanāvraje-

nmukundasevyanyavadaṅga saṃsṛtim|

smaranmukundāṅghryupagūhanaṃ puna-

rvihātumicchenna rasagraho yataḥ|| 19

अर्थ

व्यासजी! जो भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दका सेवक है वह भजन न करनेवाले कर्मी मनुष्योंके समान दैवात् कभी बुरा भाव हो जानेपर भी जन्म-मृत्युमय संसारमें नहीं आता। वह भगवान्‌के चरणकमलोंके आलिंगनका स्मरण करके फिर उसे छोड़ना नहीं चाहता; उसे रसका चसका जो लग चुका है॥ १९॥✎ 40 41 42 43 44 45 46 1571 1572

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (10)
  • #40 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #41 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #42 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #43 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #44 शब्दोंके बीचका स्थान: कोअर्पण → को अर्पण
  • #45 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #46 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1571 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुरुषोत्तम-भगवान्‌के → पुरुषोत्तमभगवान्‌के
  • #1572 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अचिन्त्य-शक्ति → अचिन्त्यशक्ति
  • #2005 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): न्दाङ्घ्रॺुपगू → न्दाङ्घ्र्युपगू

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