श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.21

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

त्वमात्मनाऽऽत्मानमवेह्यमोघदृक्

परस्य पुंसः परमात्मनः कलाम्।

अजं प्रजातं जगतः शिवाय त-

न्महानुभावाभ्युदयोऽधिगण्यताम्॥ २१

tvamātmanā''tmānamavehyamoghadṛk

parasya puṃsaḥ paramātmanaḥ kalām|

ajaṃ prajātaṃ jagataḥ śivāya ta-

nmahānubhāvābhyudayo'dhigaṇyatām|| 21

अर्थ

व्यासजी! आपकी दृष्टि अमोघ है; आप इस बातको जानिये कि आप पुरुषोत्तमभगवान्‌के कलावतार हैं। आपने अजन्मा होकर भी जगत‍्के कल्याणके लिये जन्म ग्रहण किया है। इसलिये आप विशेषरूपसे भगवान्‌की लीलाओंका कीर्तन कीजिये॥ २१॥✎ 40 41 42 43 44 45 46 1571 1572

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (9)
  • #40 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #41 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #42 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #43 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #44 शब्दोंके बीचका स्थान: कोअर्पण → को अर्पण
  • #45 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #46 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1571 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुरुषोत्तम-भगवान्‌के → पुरुषोत्तमभगवान्‌के
  • #1572 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अचिन्त्य-शक्ति → अचिन्त्यशक्ति

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