॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.5.24
ते मय्यपेताखिलचापलेऽर्भके
दान्तेऽधृतक्रीडनकेऽनुवर्तिनि ।
चक्रुः कृपां यद्यपि तुल्यदर्शनाः
शुश्रूषमाणे मुनयोऽल्पभाषिणि॥ २४
te mayyapetākhilacāpale'rbhake
dānte'dhṛtakrīḍanake'nuvartini |
cakruḥ kṛpāṃ yadyapi tulyadarśanāḥ
śuśrūṣamāṇe munayo'lpabhāṣiṇi|| 24
अर्थ
मैं यद्यपि बालक था, फिर भी किसी प्रकारकी चंचलता नहीं करता था, जितेन्द्रिय था, खेल-कूदसे दूर रहता था और आज्ञानुसार उनकी सेवा करता था। मैं बोलता भी बहुत कम था। मेरे इस शील-स्वभावको देखकर समदर्शी मुनियोंने मुझ सेवकपर अत्यन्त अनुग्रह किया॥ २४॥✎ 47