श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.3

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

जिज्ञासितं सुसम्पन्‍नमपि ते महदद्भुतम्।

कृतवान् भारतं यस्त्वं सर्वार्थपरिबृंहितम्॥ ३

jijñāsitaṃ susampannamapi te mahadadbhutam|

kṛtavān bhārataṃ yastvaṃ sarvārthaparibṛṃhitam|| 3

अर्थ

अवश्य ही आपकी जिज्ञासा तो भलीभाँति पूर्ण हो गयी है; क्योंकि आपने जो यह महाभारतकी रचना की है, वह बड़ी ही अद्भुत है। वह धर्म आदि सभी पुरुषार्थोंसे परिपूर्ण है॥ ३॥

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