श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.34

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

एवं नृणां क्रियायोगाः सर्वे संसृतिहेतवः।

त एवात्मविनाशाय कल्पन्ते कल्पिताः परे॥ ३४

evaṃ nṛṇāṃ kriyāyogāḥ sarve saṃsṛtihetavaḥ|

ta evātmavināśāya kalpante kalpitāḥ pare|| 34

अर्थ

इसी प्रकार यद्यपि सभी कर्म मनुष्योंको जन्म-मृत्युरूप संसारके चक्रमें डालनेवाले हैं, तथापि जब वे भगवान्‌को समर्पित कर दिये जाते हैं, तब उनका कर्मपना ही नष्ट हो जाता है॥ ३४॥✎ 50 51 52

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #50 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #51 शब्दोंके बीचका स्थान: कोसमर्पित → को समर्पित
  • #52 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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