श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.6

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

स वै भवान् वेद समस्तगुह्य-

मुपासितो यत्पुरुषः पुराणः।

परावरेशो मनसैव विश्‍वं

सृजत्यवत्यत्ति गुणैरसङ्गः॥ ६

sa vai bhavān veda samastaguhya-

mupāsito yatpuruṣaḥ purāṇaḥ|

parāvareśo manasaiva viśvaṃ

sṛjatyavatyatti guṇairasaṅgaḥ|| 6

अर्थ

नारदजी! आप समस्त गोपनीय रहस्योंको जानते हैं; क्योंकि आपने उन पुराणपुरुषकी उपासना की है, जो प्रकृति-पुरुष दोनोंके स्वामी हैं और असंग रहते हुए ही अपने संकल्पमात्रसे गुणोंके द्वारा संसारकी सृष्टि, स्थिति और प्रलय करते रहते हैं॥ ६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें