॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.5.6
स वै भवान् वेद समस्तगुह्य-
मुपासितो यत्पुरुषः पुराणः।
परावरेशो मनसैव विश्वं
सृजत्यवत्यत्ति गुणैरसङ्गः॥ ६
sa vai bhavān veda samastaguhya-
mupāsito yatpuruṣaḥ purāṇaḥ|
parāvareśo manasaiva viśvaṃ
sṛjatyavatyatti guṇairasaṅgaḥ|| 6
अर्थ
नारदजी! आप समस्त गोपनीय रहस्योंको जानते हैं; क्योंकि आपने उन पुराणपुरुषकी उपासना की है, जो प्रकृति-पुरुष दोनोंके स्वामी हैं और असंग रहते हुए ही अपने संकल्पमात्रसे गुणोंके द्वारा संसारकी सृष्टि, स्थिति और प्रलय करते रहते हैं॥ ६॥