श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.6.16

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

तस्मिन्‍निर्मनुजेऽरण्ये पिप्पलोपस्थ आस्थितः१।

आत्मनाऽऽत्मानमात्मस्थं२ यथाश्रुतमचिन्तयम्॥ १६

tasminnirmanuje'raṇye pippalopastha āsthitaḥ|

ātmanā''tmānamātmasthaṃ yathāśrutamacintayam|| 16

अर्थ

उस विजन वनमें एक पीपलके नीचे आसन लगाकर मैं बैठ गया। उन महात्माओंसे जैसा मैंने सुना था, हृदयमें रहनेवाले परमात्माके उसी स्वरूपका मैं मन-ही-मन ध्यान करने लगा॥ १६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—आश्रितः।

    (मुद्रित पृष्ठ 104)
  2. २

    प्रा० पा०—आत्मनाऽऽत्मस्थमात्मानं।

    (मुद्रित पृष्ठ 104)

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