श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.6.25

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

मतिर्मयि निबद्धेयं न विपद्येत कर्हिचित्।

प्रजासर्गनिरोधेऽपि स्मृतिश्‍च मदनुग्रहात्॥ २५

matirmayi nibaddheyaṃ na vipadyeta karhicit|

prajāsarganirodhe'pi smṛtiśca madanugrahāt|| 25

अर्थ

मुझे प्राप्त करनेका तुम्हारा यह दृढ़ निश्‍चय कभी किसी प्रकार नहीं टूटेगा। समस्त सृष्टिका प्रलय हो जानेपर भी मेरी कृपासे तुम्हें मेरी स्मृति बनी रहेगी’॥ २५॥✎ 55 56 57

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #55 शब्दोंके बीचका स्थान: कोसिर → को सिर
  • #56 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #57 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने, → भगवान्‌ने,

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