‘कल्याणि! मैं तुम्हारे आँसू तब पोछूँगा, जब उस आततायी* ब्राह्मणाधमका सिर गाण्डीव-धनुषके बाणोंसे काटकर तुम्हें भेंट करूँगा और पुत्रोंकी अन्त्येष्टि क्रियाके बाद तुम उसपर पैर रखकर स्नान करोगी’॥ १६॥
तदा शुचस्ते प्रमृजामि भद्रे यद्ब्रह्मबन्धोः शिर आततायिनः।
गाण्डीवमुक्तैर्विशिखैरुपाहरे त्वाऽऽक्रम्य यत्स्नास्यसि दग्धपुत्रा॥ १६
‘कल्याणि! मैं तुम्हारे आँसू तब पोछूँगा, जब उस आततायी ब्राह्मणाधमका सिर गाण्डीव-धनुषके बाणोंसे काटकर तुम्हें भेंट करूँगा और पुत्रोंकी अन्त्येष्टि क्रियाके बाद तुम उसपर पैर रखकर स्नान करोगी’॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.7.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 108) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/7/16/
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आग लगानेवाला, जहर देनेवाला, बुरी नीयतसे हाथमें शस्त्र ग्रहण करनेवाला, धन लूटनेवाला, खेत और स्त्रीको छीननेवाला—ये छः ‘आततायी’ कहलाते हैं।