तीनों लोकोंको जलानेवाली उन दोनों अस्त्रोंकी बढ़ी हुई लपटोंसे प्रजा जलने लगी और उसे देखकर सबने यही समझा कि यह प्रलयकालकी सांवर्तक अग्नि है॥ ३१॥✎ 666768
दृष्ट्वास्त्रतेजस्तु तयोस्त्रीँल्लोकान् प्रदहन्महत्।
दह्यमानाः प्रजाः सर्वाः सांवर्तकममंसत॥ ३१
तीनों लोकोंको जलानेवाली उन दोनों अस्त्रोंकी बढ़ी हुई लपटोंसे प्रजा जलने लगी और उसे देखकर सबने यही समझा कि यह प्रलयकालकी सांवर्तक अग्नि है॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.7.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 110) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/7/31/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)