श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.33

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तत आसाद्य तरसा दारुणं गौतमीसुतम्।

बबन्धामर्षताम्राक्षः पशुं रशनया यथा॥ ३३

tata āsādya tarasā dāruṇaṃ gautamīsutam|

babandhāmarṣatāmrākṣaḥ paśuṃ raśanayā yathā|| 33

अर्थ

अर्जुनकी आँखें क्रोधसे लाल-लाल हो रही थीं। उन्होंने झपटकर उस क्रूर अश्‍वत्थामाको पकड़ लिया और जैसे कोई रस्सीसे पशुको बाँध ले, वैसे ही बाँध लिया॥ ३३॥✎ 66 67 68

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #66 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #67 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #68 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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