श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.53

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

ब्रह्मबन्धुर्न हन्तव्य आततायी वधार्हणः१।

मयैवोभयमाम्नातं परिपाह्यनुशासनम्॥ ५३

brahmabandhurna hantavya ātatāyī vadhārhaṇaḥ|

mayaivobhayamāmnātaṃ paripāhyanuśāsanam|| 53

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—‘पतित ब्राह्मणका भी वध नहीं करना चाहिये और आततायीको मार ही डालना चाहिये’—शास्त्रोंमें मैंने ही ये दोनों बातें कही हैं। इसलिये मेरी दोनों आज्ञाओंका पालन करो॥ ५३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—वधार्हकः।

    (मुद्रित पृष्ठ 112)

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