श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.14

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

अन्तःस्थः सर्वभूतानामात्मा योगेश्‍वरो हरिः।

स्वमाययाऽऽवृणोद्गर्भं वैराट्याः कुरुतन्तवे॥ १४

antaḥsthaḥ sarvabhūtānāmātmā yogeśvaro hariḥ|

svamāyayā''vṛṇodgarbhaṃ vairāṭyāḥ kurutantave|| 14

अर्थ

योगेश्‍वर श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराजमान आत्मा हैं। उन्होंने उत्तराके गर्भको पाण्डवोंकी वंशपरम्परा चलानेके लिये अपनी मायाके कवचसे ढक दिया॥ १४॥

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