श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.23

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

यथा हृषीकेश खलेन देवकी कंसेन रुद्धातिचिरं शुचार्पिता।

विमोचिताहं च सहात्मजा विभो त्वयैव नाथेन मुहुर्विपद्गणात्॥ २३

yathā hṛṣīkeśa khalena devakī kaṃsena ruddhāticiraṃ śucārpitā|

vimocitāhaṃ ca sahātmajā vibho tvayaiva nāthena muhurvipadgaṇāt|| 23

अर्थ

हृषीकेश! जैसे आपने दुष्ट कंसके द्वारा कैद की हुई और चिरकालसे शोकग्रस्त देवकीकी रक्षा की थी, वैसे ही पुत्रोंके साथ मेरी भी आपने बार-बार विपत्तियोंसे रक्षा की है। आप ही हमारे स्वामी हैं। आप सर्वशक्तिमान् हैं। श्रीकृष्ण! कहाँतक गिनाऊँ—विषसे, लाक्षागृहकी भयानक आगसे, हिडिम्ब आदि राक्षसोंकी दृष्टिसे, दुष्टोंकी द्यूतसभासे, वनवासकी विपत्तियोंसे और अनेक बारके युद्धोंमें अनेक महारथियोंके शस्त्रास्त्रोंसे और अभी-अभी इस अश्‍वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे भी आपने ही हमारी रक्षा की है॥ २३-२४॥

यह अर्थ श्लोक 23–24 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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