श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.26

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

जन्मैश्‍वर्यश्रुतश्रीभिरेधमानमदः पुमान्।

नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वामकिञ्चनगोचरम्॥ २६

janmaiśvaryaśrutaśrībhiredhamānamadaḥ pumān|

naivārhatyabhidhātuṃ vai tvāmakiñcanagocaram|| 26

अर्थ

ऊँचे कुलमें जन्म, ऐश्‍वर्य, विद्या और सम्पत्तिके कारण जिसका घमंड बढ़ रहा है, वह मनुष्य तो आपका नाम भी नहीं ले सकता; क्योंकि आप तो उन लोगोंको दर्शन देते हैं जो अकिंचन हैं॥ २६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें