श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.41

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

अथ विश्वेश विश्वात्मन् विश्‍वमूर्ते स्वकेषु मे।

स्नेहपाशमिमं छिन्धि दृढं पाण्डुषु वृष्णिषु॥ ४१

atha viśveśa viśvātman viśvamūrte svakeṣu me|

snehapāśamimaṃ chindhi dṛḍhaṃ pāṇḍuṣu vṛṣṇiṣu|| 41

अर्थ

आप विश्‍वके स्वामी हैं, विश्‍वके आत्मा हैं और विश्‍वरूप हैं। यदुवंशियों और पाण्डवोंमें मेरी बड़ी ममता हो गयी है। आप कृपा करके स्वजनोंके साथ जोड़े हुए इस स्नेहकी दृढ़ फाँसीको काट दीजिये॥ ४१॥✎ 1574

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1574 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अग्‍नि-स्वरूप → अग्‍निस्वरूप

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