श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.48

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

अहो मे पश्यताज्ञानं हृदि रूढं दुरात्मनः।

पारक्यस्यैव देहस्य बह्व्यो मेऽक्षौहिणीर्हताः॥ ४८✎ 2006

aho me paśyatājñānaṃ hṛdi rūḍhaṃ durātmanaḥ|

pārakyasyaiva dehasya bahvyo me'kṣauhiṇīrhatāḥ|| 48

अर्थ

शौनकादि ऋषियो! धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको अपने स्वजनोंके वधसे बड़ी चिन्ता हुई। वे अविवेकयुक्त चित्तसे स्नेह और मोहके वशमें होकर कहने लगे—भला, मुझ दुरात्माके हृदयमें बद्धमूल हुए इस अज्ञानको तो देखो; मैंने सियार-कुत्तोंके आहार इस अनात्मा शरीरके लिये अनेक अक्षौहिणी* सेनाका नाश कर डाला॥ ४७-४८॥✎ 70 71

यह अर्थ श्लोक 47–48 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. *

    २१,८७० रथ, २१,८७० हाथी, १,०९,३५० पैदल और ६५,६०० घुड़सवार—इतनी सेनाको अक्षौहिणी कहते हैं। (महाभारत)

    (मुद्रित पृष्ठ 118)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #70 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #71 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #2006 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): स्य बह्वॺो मे → स्य बह्व्यो मे

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