श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.12

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

अहो कष्टमहोऽन्याय्यं यद्यूयं धर्मनन्दनाः।

जीवितुं नार्हथ क्लिष्टं२ विप्रधर्माच्युताश्रयाः॥ १२

aho kaṣṭamaho'nyāyyaṃ yadyūyaṃ dharmanandanāḥ|

jīvituṃ nārhatha kliṣṭaṃ vipradharmācyutāśrayāḥ|| 12

अर्थ

‘धर्मपुत्रो! हाय! हाय! यह बड़े कष्ट और अन्यायकी बात है कि तुमलोगोंको ब्राह्मण, धर्म और भगवान्‌के आश्रित रहनेपर भी इतने कष्टके साथ जीना पड़ा, जिसके तुम कदापि योग्य नहीं थे॥ १२॥✎ 1575

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—कृच्छ्रं।

    (मुद्रित पृष्ठ 120)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1575 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भीष्म-पितामहके → भीष्मपितामहके

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