श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.34

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक्कचलुलितश्रमवार्यलङ्कृतास्ये ।✎ 1511

मम निशितशरैर्विभिद्यमानत्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा॥ ३४✎ 1512

yudhi turagarajovidhūmraviṣvakkacalulitaśramavāryalaṅkṛtāsye |

mama niśitaśarairvibhidyamānatvaci vilasatkavace'stu kṛṣṇa ātmā|| 34

अर्थ

मुझे युद्धके समयकी उनकी वह विलक्षण छबि याद आती है। उनके मुखपर लहराते हुए घुँघराले बाल घोड़ोंकी टॉपकी धूलसे मटमैले हो गये थे और पसीनेकी छोटी-छोटी बूँदें शोभायमान हो रही थीं। मैं अपने तीखे बाणोंसे उनकी त्वचाको बींध रहा था। उन सुन्दर कवचमण्डित भगवान् श्रीकृष्णके प्रति मेरा शरीर, अन्तःकरण और आत्मा समर्पित हो जायँ॥ ३४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1511 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: तुरगरजोविधूम्रविष्वक्- कचलुलितश्रमवार्यलङ्कृतास्ये → तुरगरजोविधूम्रविष्वक्कचलुलितश्रमवार्यलङ्कृतास्ये
  • #1512 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निशितशरैर्विभिद्यमान- त्वचि → निशितशरैर्विभिद्यमानत्वचि

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें