श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.39

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

विजयरथकुटुम्ब आत्ततोत्रे धृतहयरश्मिनि तच्छ्रियेक्षणीये।

भगवति रतिरस्तु मे मुमूर्षोर्यमिह निरीक्ष्य हता गताः सरूपम्॥ ३९ ✎ 1516

vijayarathakuṭumba āttatotre dhṛtahayaraśmini tacchriyekṣaṇīye|

bhagavati ratirastu me mumūrṣoryamiha nirīkṣya hatā gatāḥ sarūpam|| 39

अर्थ

अर्जुनके रथकी रक्षामें सावधान जिन श्रीकृष्णके बायें हाथमें घोड़ोंकी रास थी और दाहिने हाथमें चाबुक, इन दोनोंकी शोभासे उस समय जिनकी अपूर्व छवि बन गयी थी, तथा महाभारतयुद्धमें मरनेवाले वीर जिनकी इस छविका दर्शन करते रहनेके कारण सारूप्य मोक्षको प्राप्त हो गये, उन्हीं पार्थसारथि भगवान् श्रीकृष्णमें मुझ मरणासन्‍नकी परम प्रीति हो॥ ३९॥✎ 1577

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1516 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मुमूर्षो- र्यमिह → मुमूर्षोर्यमिह
  • #1577 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: रूप-से → रूपसे

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