श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.45

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

तत्र दुन्दुभयो नेदुर्देवमा३नववादिताः।

शशंसुः साधवो राज्ञां खात्पेतुः पुष्पवृष्टयः॥ ४५

tatra dundubhayo nedurdevamānavavāditāḥ|

śaśaṃsuḥ sādhavo rājñāṃ khātpetuḥ puṣpavṛṣṭayaḥ|| 45

अर्थ

उस समय देवता और मनुष्य नगारे बजाने लगे। साधुस्वभावके राजा उनकी प्रशंसा करने लगे और आकाशसे पुष्पोंकी वर्षा होने लगी॥ ४५॥✎ 74

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—दानव०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 124)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #74 शब्दोंके बीचका स्थान: ४५॥शौनकजी! → ४५॥ शौनकजी!

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