॥ श्रीहरिः ॥
तत्र ब्रह्मर्षयः सर्वे देवर्षयश्च सत्तम।
राजर्षयश्च तत्रासन् द्रष्टुं भरतपुङ्गवम्॥ ५
tatra brahmarṣayaḥ sarve devarṣayaśca sattama|
rājarṣayaśca tatrāsan draṣṭuṃ bharatapuṅgavam|| 5
अर्थ
शौनकजी! उसी समय भरतवंशियोंके गौरवरूप भीष्मपितामहको देखनेके लिये सभी ब्रह्मर्षि, देवर्षि और राजर्षि वहाँ आये॥ ५॥
तत्र ब्रह्मर्षयः सर्वे देवर्षयश्च सत्तम।
राजर्षयश्च तत्रासन् द्रष्टुं भरतपुङ्गवम्॥ ५
शौनकजी! उसी समय भरतवंशियोंके गौरवरूप भीष्मपितामहको देखनेके लिये सभी ब्रह्मर्षि, देवर्षि और राजर्षि वहाँ आये॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.9.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 119) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/9/5/