॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.50.8
अक्षौहिणीभिः संख्यातं भटाश्वरथकुंजरैः।
मागधस्तु न हन्तव्यो भूयः कर्ता बलोद्यमम्॥ ८
akṣauhiṇībhiḥ saṃkhyātaṃ bhaṭāśvarathakuṃjaraiḥ|
māgadhastu na hantavyo bhūyaḥ kartā balodyamam|| 8
अर्थ
उन्होंने सोचा यह बड़ा अच्छा हुआ कि मगधराज जरासन्धने अपने अधीनस्थ नरपतियोंकी पैदल, घुड़सवार, रथी और हाथियोंसे युक्त कई अक्षौहिणी सेना इकट्ठी कर ली है। यह सब तो पृथ्वीका भार ही जुटकर मेरे पास आ पहुँचा है। मैं इसका नाश करूँगा। परन्तु अभी मगधराज जरासन्धको नहीं मारना चाहिये। क्योंकि वह जीवित रहेगा तो फिरसे असुरोंकी बहुत-सी सेना इकट्ठी कर लायेगा॥ ७-८॥✎ 1682