श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

स उत्थाय चिरं सुप्तः शनैरुन्मील्य लोचने।

दिशो विलोकयन् पार्श्‍वे तमद्राक्षीदवस्थितम्॥ ११

sa utthāya ciraṃ suptaḥ śanairunmīlya locane|

diśo vilokayan pārśve tamadrākṣīdavasthitam|| 11

अर्थ

वह पुरुष वहाँ बहुत दिनोंसे सोया हुआ था। पैरकी ठोकर लगनेसे वह उठ पड़ा और धीरे-धीरे उसने अपनी आँखें खोलीं। इधर-उधर देखनेपर पास ही कालयवन खड़ा हुआ दिखायी दिया॥ ११॥

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