श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

एवमुक्तः स वै देवानभिवन्द्य महायशाः।

अशयिष्ट गुहाविष्टो निद्रया देवदत्तया॥ २१

evamuktaḥ sa vai devānabhivandya mahāyaśāḥ|

aśayiṣṭa guhāviṣṭo nidrayā devadattayā|| 21

अर्थ

परम यशस्वी राजा मुचुकुन्दने देवताओंके इस प्रकार कहनेपर उनकी वन्दना की और बहुत थके होनेके कारण निद्राका ही वर माँगा तथा उनसे वर पाकर वे नींदसे भरकर पर्वतकी गुफामें जा सोये॥ २१॥

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