श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

मुचुकुन्द उवाच

को भवानिह सम्प्राप्तो विपिने गिरिगह्वरे।

पद‍्भ्यां पद्मपलाशाभ्यां विचरस्युरुकण्टके॥ २८

ko bhavāniha samprāpto vipine girigahvare|

padbhyāṃ padmapalāśābhyāṃ vicarasyurukaṇṭake|| 28

अर्थ

राजा मुचुकुन्दने कहा—‘आप कौन हैं? इस काँटोंसे भरे हुए घोर जंगलमें आप कमलके समान कोमल चरणोंसे क्यों विचर रहे हैं? और इस पर्वतकी गुफामें ही पधारनेका क्या प्रयोजन था?॥ २८॥

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