श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

शुश्रूषतामव्यलीकमस्माकं नरपुंगव।

स्वजन्म कर्म गोत्रं वा कथ्यतां यदि रोचते॥ ३१

śuśrūṣatāmavyalīkamasmākaṃ narapuṃgava|

svajanma karma gotraṃ vā kathyatāṃ yadi rocate|| 31

अर्थ

पुरुषश्रेष्ठ! यदि आपको रुचे तो हमें अपना जन्म, कर्म और गोत्र बतलाइये; क्योंकि हम सच्चे हृदयसे उसे सुननेके इच्छुक हैं॥ ३१॥

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