श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.46

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

मुचुकुन्द उवाच

विमोहितोऽयं जन ईश मायया

त्वदीयया त्वां न भजत्यनर्थदृक्।

सुखाय दुःखप्रभवेषु सज्जते

गृहेषु योषित् पुरुषश्‍च वंचितः॥ ४६

vimohito'yaṃ jana īśa māyayā

tvadīyayā tvāṃ na bhajatyanarthadṛk|

sukhāya duḥkhaprabhaveṣu sajjate

gṛheṣu yoṣit puruṣaśca vaṃcitaḥ|| 46

अर्थ

मुचुकुन्दने कहा—‘प्रभो! जगत‍्के सभी प्राणी आपकी मायासे अत्यन्त मोहित हो रहे हैं। वे आपसे विमुख होकर अनर्थमें ही फँसे रहते हैं और आपका भजन नहीं करते। वे सुखके लिये घर-गृहस्थीके उन झंझटोंमें फँस जाते हैं, जो सारे दुःखोंके मूल स्रोत हैं। इस तरह स्त्री और पुरुष सभी ठगे जा रहे हैं॥ ४६॥

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