श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.53

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

करोति कर्माणि तपस्सुनिष्ठितो

निवृत्तभोगस्तदपेक्षया ददत्।

पुनश्‍च भूयेयमहं स्वराडिति

प्रवृद्धतर्षो न सुखाय कल्पते॥ ५३

karoti karmāṇi tapassuniṣṭhito

nivṛttabhogastadapekṣayā dadat|

punaśca bhūyeyamahaṃ svarāḍiti

pravṛddhatarṣo na sukhāya kalpate|| 53

अर्थ

बहुत-से लोग विषय-भोग छोड़कर पुनः राज्यादि भोग मिलनेकी इच्छासे ही दान-पुण्य करते हैं और ‘मैं फिर जन्म लेकर सबसे बड़ा परम स्वतन्त्र सम्राट् होऊँ।’ ऐसी कामना रखकर तपस्यामें भलीभाँति स्थित हो शुभकर्म करते हैं। इस प्रकार जिसकी तृष्णा बढ़ी हुई है, वह कदापि सुखी नहीं हो सकता॥ ५३॥

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