श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.55

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

मन्ये ममानुग्रह ईश ते कृतो

राज्यानुबन्धापगमो यदृच्छया।

यः प्रार्थ्यते साधुभिरेकचर्यया

वनं विविक्षद्भिरखण्डभूमिपैः॥ ५५

manye mamānugraha īśa te kṛto

rājyānubandhāpagamo yadṛcchayā|

yaḥ prārthyate sādhubhirekacaryayā

vanaṃ vivikṣadbhirakhaṇḍabhūmipaiḥ|| 55

अर्थ

भगवन्! मैं तो ऐसा समझता हूँ कि आपने मेरे ऊपर परम अनुग्रहकी वर्षा की, क्योंकि बिना किसी परिश्रमके—अनायास ही मेरे राज्यका बन्धन टूट गया। साधु-स्वभावके चक्रवर्ती राजा भी जब अपना राज्य छोड़कर एकान्तमें भजन-साधन करनेके उद्देश्यसे वनमें जाना चाहते हैं, तब उसके ममता-बन्धनसे मुक्त होनेके लिये बड़े प्रेमसे आपसे प्रार्थना किया करते हैं॥ ५५॥

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