श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

इति निश्‍चित्य यवनः प्राद्रवन्तं पराङ्मुखम्।

अन्वधावज्जिघृक्षुस्तं दुरापमपि योगिनाम्॥ ६

iti niścitya yavanaḥ prādravantaṃ parāṅmukham|

anvadhāvajjighṛkṣustaṃ durāpamapi yoginām|| 6

अर्थ

ऐसा निश्‍चय करके जब कालयवन भगवान् श्रीकृष्णकी ओर दौड़ा, तब वे दूसरी ओर मुँह करके रणभूमिसे भाग चले और उन योगिदुर्लभ प्रभुको पकड़नेके लिये कालयवन उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगा॥ ६॥

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