श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.52.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 52 · अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तां बुद्धिलक्षणौदार्यरूपशीलगुणाश्रयाम्।

कृष्णश्‍च सदृशीं भार्यां समुद्वोढुं मनो दधे॥ २४

tāṃ buddhilakṣaṇaudāryarūpaśīlaguṇāśrayām|

kṛṣṇaśca sadṛśīṃ bhāryāṃ samudvoḍhuṃ mano dadhe|| 24

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण भी समझते थे कि ‘रुक्मिणीमें बड़े सुन्दर-सुन्दर लक्षण हैं, वह परम बुद्धिमती है; उदारता, सौन्दर्य, शीलस्वभाव और गुणोंमें भी अद्वितीय है। इसलिये रुक्मिणी ही मेरे अनुरूप पत्‍नी है। अतः भगवान्‌ने रुक्मिणीजीसे विवाह करनेका निश्‍चय किया॥ २४॥

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