॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.52.43
यस्याङ्घ्रिपंकजरजःस्नपनं महान्तो
वाञ्छन्त्युमापतिरिवात्मतमोऽपहत्यै।
यर्ह्यम्बुजाक्ष न लभेय भवत्प्रसादं
जह्यामसून् व्रतकृशाञ्छतजन्मभिः स्यात्॥ ४३
yasyāṅghripaṃkajarajaḥsnapanaṃ mahānto
vāñchantyumāpatirivātmatamo'pahatyai|
yarhyambujākṣa na labheya bhavatprasādaṃ
jahyāmasūn vratakṛśāñchatajanmabhiḥ syāt|| 43
अर्थ
कमलनयन! उमापति भगवान् शंकरके समान बड़े-बड़े महापुरुष भी आत्मशुद्धिके लिये आपके चरणकमलोंकी धूलसे स्नान करना चाहते हैं। यदि मैं आपका वह प्रसाद, आपकी वह चरणधूल नहीं प्राप्त कर सकी तो व्रतद्वारा शरीरको सुखाकर प्राण छोड़ दूँगी। चाहे उसके लिये सैकड़ों जन्म क्यों न लेने पड़ें, कभी-न-कभी तो आपका वह प्रसाद अवश्य ही मिलेगा॥ ४३॥