श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.52.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 52 · अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

विहाय वित्तं प्रचुरमभीतौ भीरुभीतवत्।

पद‍्भ्यां पद्मपलाशाभ्यां चेरतुर्बहुयोजनम्॥ ८

vihāya vittaṃ pracuramabhītau bhīrubhītavat|

padbhyāṃ padmapalāśābhyāṃ ceraturbahuyojanam|| 8

अर्थ

उनके मनमें तनिक भी भय न था। फिर भी मानो अत्यन्त भयभीत हो गये हों—इस प्रकारका नाट्य करते हुए, वह सब-का-सब धन वहीं छोड़कर अनेक योजनोंतक वे अपने कमलदलके समान सुकोमल चरणोंसे ही—पैदल भागते चले गये॥ ८॥✎ 1685

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1685 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: धरती-पर → धरतीपर

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