उनके मनमें तनिक भी भय न था। फिर भी मानो अत्यन्त भयभीत हो गये हों—इस प्रकारका नाट्य करते हुए, वह सब-का-सब धन वहीं छोड़कर अनेक योजनोंतक वे अपने कमलदलके समान सुकोमल चरणोंसे ही—पैदल भागते चले गये॥ ८॥✎ 1685
विहाय वित्तं प्रचुरमभीतौ भीरुभीतवत्।
पद्भ्यां पद्मपलाशाभ्यां चेरतुर्बहुयोजनम्॥ ८
उनके मनमें तनिक भी भय न था। फिर भी मानो अत्यन्त भयभीत हो गये हों—इस प्रकारका नाट्य करते हुए, वह सब-का-सब धन वहीं छोड़कर अनेक योजनोंतक वे अपने कमलदलके समान सुकोमल चरणोंसे ही—पैदल भागते चले गये॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.52.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 461) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/52/8/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)