श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.53.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 53 · अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

अपि मय्यनवद्यात्मा दृष्ट्वा किंचिज्जुगुप्सितम्।

मत्पाणिग्रहणे नूनं नायाति हि कृतोद्यमः॥ २४

api mayyanavadyātmā dṛṣṭvā kiṃcijjugupsitam|

matpāṇigrahaṇe nūnaṃ nāyāti hi kṛtodyamaḥ|| 24

अर्थ

इसमें सन्देह नहीं कि भगवान् श्रीकृष्णका स्वरूप परम शुद्ध है और विशुद्ध पुरुष ही उनसे प्रेम कर सकते हैं। उन्होंने मुझमें कुछ-न-कुछ बुराई देखी होगी, तभी तो मेरे हाथ पकड़नेके लिये—मुझे स्वीकार करनेके लिये उद्यत होकर वे यहाँ नहीं पधार रहे हैं?॥ २४॥

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