श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.53.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 53 · अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तमागतं समाज्ञाय वैदर्भी हृष्टमानसा।

न पश्यन्ती ब्राह्मणाय प्रियमन्यन्‍ननाम सा॥ ३१

tamāgataṃ samājñāya vaidarbhī hṛṣṭamānasā|

na paśyantī brāhmaṇāya priyamanyannanāma sā|| 31

अर्थ

भगवान्‌के शुभागमनका समाचार सुनकर रुक्मिणीजीका हृदय आनन्दातिरेकसे भर गया। उन्होंने इसके बदलेमें ब्राह्मणके लिये भगवान्‌के अतिरिक्त और कुछ प्रिय न देखकर उन्होंने केवल नमस्कार कर लिया। अर्थात् जगत‍्की समग्र लक्ष्मी ब्राह्मणदेवताको सौंप दी॥ ३१॥

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