॥ श्रीहरिः ॥
मधुपर्कमुपानीय वासांसि विरजांसि सः।
उपायनान्यभीष्टानि विधिवत् समपूजयत्॥ ३३
madhuparkamupānīya vāsāṃsi virajāṃsi saḥ|
upāyanānyabhīṣṭāni vidhivat samapūjayat|| 33
अर्थ
और मधुपर्क, निर्मल वस्त्र तथा उत्तम-उत्तम भेंट देकर विधिपूर्वक उनकी पूजा की॥ ३३॥
मधुपर्कमुपानीय वासांसि विरजांसि सः।
उपायनान्यभीष्टानि विधिवत् समपूजयत्॥ ३३
और मधुपर्क, निर्मल वस्त्र तथा उत्तम-उत्तम भेंट देकर विधिपूर्वक उनकी पूजा की॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.53.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 470) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/53/33/