॥ श्रीहरिः ॥
गायन्तश्च स्तुवन्तश्च गायका वाद्यवादकाः।
परिवार्य वधूं जग्मुः सूतमागधवन्दिनः॥ ४३
gāyantaśca stuvantaśca gāyakā vādyavādakāḥ|
parivārya vadhūṃ jagmuḥ sūtamāgadhavandinaḥ|| 43
अर्थ
गवैये गाते जाते थे, बाजेवाले बाजे बजाते चलते थे और सूत, मागध तथा वंदीजन दुलहिनके चारों ओर जय-जयकार करते—विरद बखानते जा रहे थे॥ ४३॥
गायन्तश्च स्तुवन्तश्च गायका वाद्यवादकाः।
परिवार्य वधूं जग्मुः सूतमागधवन्दिनः॥ ४३
गवैये गाते जाते थे, बाजेवाले बाजे बजाते चलते थे और सूत, मागध तथा वंदीजन दुलहिनके चारों ओर जय-जयकार करते—विरद बखानते जा रहे थे॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.53.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 471) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/53/43/