श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.53.52

दशम स्कन्ध · अध्याय 53 · अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

शुचिस्मितां बिम्बफलाधरद्युति-

शोणायमानद्विजकुन्दकुड्मलाम्।

पदा चलन्तीं कलहंसगामिनीं

शिंजत्कलानूपुरधामशोभिना ।

विलोक्य वीरा मुमुहुः समागता

यशस्विनस्तत्कृतहृच्छयार्दिताः ॥ ५२

śucismitāṃ bimbaphalādharadyuti-

śoṇāyamānadvijakundakuḍmalām|

padā calantīṃ kalahaṃsagāminīṃ

śiṃjatkalānūpuradhāmaśobhinā |

vilokya vīrā mumuhuḥ samāgatā

yaśasvinastatkṛtahṛcchayārditāḥ || 52

अर्थ

उनके होठोंपर मनोहर मुसकान थी। उनके दाँतोंकी पाँत थी तो कुन्दकलीके समान परम उज्ज्वल, परन्तु पके हुए कुँदरूके समान लाल-लाल होठोंकी चमकसे उसपर भी लालिमा आ गयी थी। उनके पाँवोंके पायजेब चमक रहे थे और उनमें लगे हुए छोटे-छोटे घुँघरू रुनझुन-रुनझुन कर रहे थे। वे अपने सुकुमार चरण-कमलोंसे पैदल ही राजहंसकी गतिसे चल रही थीं। उनकी वह अपूर्व छबि देखकर वहाँ आये हुए बड़े-बड़े यशस्वी वीर सब मोहित हो गये। कामदेवने ही भगवान्‌का कार्य सिद्ध करनेके लिये अपने बाणोंसे उनका हृदय जर्जर कर दिया॥ ५२॥

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