श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तानापतत आलोक्य यादवानीकयूथपाः।

तस्थुस्तत्संमुखा राजन्विस्फूर्ज्य स्वधनूंषि ते॥ २

tānāpatata ālokya yādavānīkayūthapāḥ|

tasthustatsaṃmukhā rājanvisphūrjya svadhanūṃṣi te|| 2

अर्थ

राजन्! जब यदुवंशियोंके सेनापतियोंने देखा कि शत्रुदल हमपर चढ़ा आ रहा है, तब उन्होंने भी अपने-अपने धनुषका टंकार किया और घूमकर उनके सामने डट गये॥ २॥✎ 1688 2111

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1688 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: रण-भूमिमें → रणभूमिमें
  • #2111 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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